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	<title>धर्म &#8211; theupdatesnews.com</title>
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	<title>धर्म &#8211; theupdatesnews.com</title>
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		<title>Shri Guru Tegh Bahadur Ji के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित विशाल Nagar Kirtan Srinagar से रवाना, बड़ी संख्या में संगत की मौजूदगी</title>
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		<dc:creator><![CDATA[trendstopicnews@gmail.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Thu, 20 Nov 2025 05:15:46 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित ऐतिहासिक और विशाल नगर कीर्तन आज श्रीनगर के गुरुद्वारा छठी पातशाही साहिब से रवाना हो गया। इस खास मौके पर पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान, AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने संगत के साथ उपस्थित होकर [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>श्री गुरु तेग बहादुर जी के 350वें शहीदी दिवस को समर्पित ऐतिहासिक और विशाल नगर कीर्तन आज श्रीनगर के गुरुद्वारा छठी पातशाही साहिब से रवाना हो गया। इस खास मौके पर पंजाब के मुख्यमंत्री <strong>भगवंत सिंह मान</strong>, AAP के राष्ट्रीय संयोजक <strong>अरविंद केजरीवाल</strong> और जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री <strong>उमर अब्दुल्ला</strong> ने संगत के साथ उपस्थित होकर माथा टेका और अरदास की।</p>
<p>नगर कीर्तन खालसा की जन्मभूमि <strong>श्री आनंदपुर साहिब</strong> की ओर जा रहा है, जहां यह <strong>22 </strong><strong>नवंबर</strong> को संपन्न होगा। रास्ते में यह जम्मू, पठानकोट, दसूहा, होशियारपुर, माहिलपुर और गढ़शंकर जैसे शहरों से गुजरेगा।<br />
रात्रि पड़ाव—</p>
<ul>
<li>19 नवंबर: <strong>जम्मू</strong></li>
<li>20 नवंबर: <strong>पठानकोट</strong></li>
<li>21 नवंबर: <strong>होशियारपुर</strong></li>
</ul>
<p>संगत की सुविधा के लिए काफिले में <strong>एंबुलेंस, </strong><strong>डिजिटल म्यूजियम, </strong><strong>लंगर की व्यवस्था और अन्य जरूरी सुविधाएँ</strong> शामिल की गई हैं।</p>
<h2><strong>गुरु साहिब की शहादत</strong><strong>—</strong><strong>मानवता के लिए अद्वितीय मिसाल</strong></h2>
<p>CM भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने कहा कि नौवें गुरु श्री गुरु तेग बहादुर जी ने मानवता और धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा के लिए अपना जीवन कुर्बान किया। उनकी शहादत का संदेश आज भी दुनिया के लिए प्रेरणा है।</p>
<p>दोनों नेताओं ने कहा कि गुरु जी का <strong>शांति, </strong><strong>प्रेम, </strong><strong>भाईचारा और मानव अधिकारों का संदेश</strong> आज के समय में भी उतना ही जरूरी है जितना सदियों पहले था। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे गुरु साहिब की बताई विचारधारा पर चलें और समाज में एकता और सद्भावना को मजबूत करें।</p>
<h2><strong>&#8220;</strong><strong>अकाल पुरख की मेहर&#8221;</strong><strong>—</strong><strong>सेवा निभाने पर पंजाब सरकार ने जताया आभार</strong></h2>
<p>इस मौके पर अरविंद केजरीवाल ने कहा कि पंजाब सरकार पर अकाल पुरख की मेहर है कि उसे इतने बड़े ऐतिहासिक आयोजन की सेवा निभाने का अवसर मिला।<br />
CM भगवंत मान ने भी कहा कि यह अवसर सरकार के लिए सौभाग्य की बात है और इस पवित्र आयोजन में कोई कमी नहीं छोड़ी जाएगी।</p>
<h2><strong>पंजाब सरकार के देश-भर में कार्यक्रम</strong></h2>
<p>शहीदी दिवस से जुड़े कार्यक्रमों की शुरुआत <strong>25 </strong><strong>अक्टूबर</strong> को दिल्ली के गुरुद्वारा <strong>सीस गंज साहिब</strong> से हुई थी। उसी दिन गुरुद्वारा <strong>रकाब गंज साहिब</strong> में भी बड़ा कीर्तन दरबार हुआ।</p>
<p>पंजाब के सभी जिलों में <strong>1 </strong><strong>से 18 </strong><strong>नवंबर तक लाइट एंड साउंड शो</strong> हुए, जिनमें गुरु साहिब के जीवन और दर्शन को दिखाया गया। जिन नगरों में गुरु साहिब के चरण पड़े, वहाँ कीर्तन दरबार आयोजित किए जा रहे हैं।<br />
18 नवंबर को श्रीनगर में भी बड़ा कीर्तन दरबार हुआ।</p>
<h2><strong>चार दिशाओं से नगर कीर्तन</strong></h2>
<p>अधिकारी जानकारी के अनुसार इस बार <strong>चार नगर कीर्तन</strong> सजाए जा रहे हैं—</p>
<ol>
<li><strong>श्रीनगर</strong> से (पहला नगर कीर्तन – जो अब रवाना हो चुका है)</li>
<li><strong>20 </strong><strong>नवंबर</strong> को तख्त श्री दमदमा साहिब (तलवंडी साबो) से</li>
<li><strong>फरीदकोट</strong> से</li>
<li><strong>गुरदासपुर</strong> से</li>
</ol>
<p>ये सभी नगर कीर्तन <strong>22 </strong><strong>नवंबर को श्री आनंदपुर साहिब</strong> पहुँचकर एक साथ मिलेंगे।</p>
<h2><strong>23 </strong><strong>से </strong><strong>25 </strong><strong>नवंबर: श्री आनंदपुर साहिब में भव्य समागम</strong></h2>
<p>इन तीन दिनों के लिए श्री आनंदपुर साहिब में “<strong>चक्क नानकी</strong>” नाम की बड़ी टेंट सिटी लगाई गई है, जहाँ हजारों श्रद्धालु ठहर सकेंगे। समागम में शामिल हैं—</p>
<ul>
<li>गुरु साहिब की शिक्षाओं पर <strong>प्रदर्शनियां</strong></li>
<li><strong>ड्रोन शो</strong></li>
<li><strong>अंतर-धर्म सम्मेलन</strong></li>
<li>24 नवंबर को <strong>पंजाब विधानसभा का विशेष सत्र</strong></li>
<li>25 नवंबर को
<ul>
<li><strong>राज्य स्तरीय रक्तदान शिविर</strong></li>
<li><strong>पौधारोपण अभियान</strong></li>
<li>विशाल <strong>“</strong><strong>सरबत दा भला” </strong><strong>एकत्रीकरण</strong></li>
</ul>
</li>
</ul>
<p>दुनिया भर के प्रमुख आध्यात्मिक नेताओं और संतों को भी इन आयोजनों में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया है।</p>
<h2><strong>सिख संगत का गर्मजोशी भरा स्वागत</strong></h2>
<p>मुख्यमंत्री मान और केजरीवाल ने कहा कि वे जम्मू-कश्मीर की सिख संगत के समर्पण और श्रद्धा से बेहद प्रभावित हुए हैं। उन्होंने खासतौर पर CM उमर अब्दुल्ला का धन्यवाद किया, जिन्होंने खुद संगत के साथ खड़े होकर इस ऐतिहासिक पल को साझा किया।</p>
<h2><strong>कार्यक्रम में मौजूद प्रमुख हस्तियाँ</strong></h2>
<p>इस मौके पर संत बाबा सेवा सिंह रामपुर खेड़ा वाले, गुरुद्वारा छठी पातशाही के प्रधान जसपाल सिंह, सचिव गुरमीत सिंह सहित कई संत महापुरुष मौजूद थे।<br />
इसके साथ ही पंजाब विधानसभा अध्यक्ष कुलतार सिंह संधवां, मंत्री हरपाल सिंह चीमा, अमन अरोड़ा, तरुणप्रीत सिंह सौंद, डॉ. बलजीत कौर, हरभजन सिंह ETO, बरिंदर गोयल, डॉ. रवजोत, हरदीप मुंडियां, सांसद बाबा बलबीर सिंह सीचेवाल और अन्य अधिकारी भी कार्यक्रम में शामिल रहे।</p>
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		<item>
		<title>Diwali आज: दोपहर 3:30 से शुरू होगा पहला पूजा मुहूर्त, जानिए लक्ष्मी पूजा की विधि और Diwali से जुड़ी 5 खास कहानियां</title>
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		<dc:creator><![CDATA[trendstopicnews@gmail.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Mon, 20 Oct 2025 04:00:14 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[आज पूरा देश दीपावली के रोशनी भरे त्योहार को मनाने की तैयारी में है। अमावस्या तिथि आज दोपहर 3:30 बजे से शुरू होगी और अगले दिन सुबह 5:25 बजे तक रहेगी। यानी आज से लेकर कल सुबह तक आप लक्ष्मी पूजन कर सकते हैं। इस बार दीपावली पर कुल 8 शुभ मुहूर्त रहेंगे। यह दिन [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>आज पूरा देश <strong>दीपावली</strong> के रोशनी भरे त्योहार को मनाने की तैयारी में है।<br />
<strong>अमावस्या तिथि</strong> आज दोपहर <strong>3:30 </strong><strong>बजे से शुरू</strong> होगी और <strong>अगले दिन सुबह </strong><strong>5:25 </strong><strong>बजे तक</strong> रहेगी।<br />
यानी आज से लेकर कल सुबह तक आप <strong>लक्ष्मी पूजन</strong> कर सकते हैं।<br />
इस बार दीपावली पर <strong>कुल </strong><strong>8 </strong><strong>शुभ मुहूर्त</strong> रहेंगे।</p>
<p>यह दिन <strong>धन</strong><strong>, </strong><strong>समृद्धि और खुशहाली की देवी लक्ष्मी</strong>, <strong>विघ्नहर्ता गणेश</strong> और <strong>धन के देवता कुबेर</strong> की पूजा को समर्पित है।<br />
लोग अपने घरों और दफ्तरों को दीयों, लाइट्स और रंगोली से सजाकर माँ लक्ष्मी का स्वागत करते हैं।</p>
<h2>दीपावली क्यों मनाई जाती है? जानिए इस पर्व की 5 प्रमुख कथाएं</h2>
<h3>1 <strong>समुद्र मंथन से देवी लक्ष्मी का प्रकट होना</strong></h3>
<p>कहानी के अनुसार, देवता और दैत्य जब <strong>अमृत पाने के लिए समुद्र मंथन</strong> कर रहे थे, तो उसमें से <strong>14 </strong><strong>रत्न</strong> निकले।<br />
इन्हीं में से एक थीं <strong>देवी लक्ष्मी</strong>।<br />
कहा जाता है कि वे पहले से मौजूद थीं, लेकिन किसी बात से नाराज होकर <strong>समुद्र में छिप गईं</strong>।<br />
हजारों साल बाद वे समुद्र मंथन से फिर प्रकट हुईं।<br />
वह दिन <strong>कार्तिक अमावस्या</strong> का था, इसलिए उसी दिन को <strong>दीपावली और लक्ष्मी पूजा</strong> के रूप में मनाया जाता है।</p>
<h3>2 <strong>मां काली की पूजा: पश्चिम बंगाल की परंपरा</strong></h3>
<p>जब देशभर में लोग लक्ष्मी पूजा करते हैं, वहीं <strong>पश्चिम बंगाल</strong> में इस दिन <strong>काली मां की पूजा</strong> होती है।<br />
माना जाता है कि <strong>मां काली</strong> ने इस रात <strong>रक्तबीज</strong> जैसे शक्तिशाली असुरों का संहार किया था।<br />
उसी रात यानी <strong>कार्तिक अमावस्या</strong> को देवी की शक्ति और विजय के प्रतीक के रूप में <strong>दीप जलाकर पूजा</strong> की जाती है।</p>
<h3>3 <strong>राजा बलि और भगवान वामन की कहानी (दक्षिण भारत)</strong></h3>
<p>यह कथा खासकर <strong>केरल और दक्षिण भारत</strong> में प्रसिद्ध है।<br />
<strong>दैत्यराज बलि</strong> एक पराक्रमी और दयालु राजा थे।<br />
उन्होंने एक बड़ा यज्ञ किया, जिससे देवताओं को लगा कि वे स्वर्गलोक पर भी अधिकार कर लेंगे।<br />
तब <strong>भगवान विष्णु</strong> ने <strong>वामन अवतार</strong> लिया और बलि से <strong>तीन पग भूमि</strong> मांगी।<br />
दो पगों में उन्होंने <strong>आसमान और धरती</strong> नाप ली और तीसरा पग बलि के सिर पर रखकर उन्हें <strong>पाताल लोक भेज दिया</strong>।<br />
लेकिन उनकी भक्ति से खुश होकर विष्णु ने उन्हें <strong>साल में एक दिन धरती पर आने की अनुमति दी</strong>।<br />
दक्षिण भारत में उसी दिन <strong>दीप जलाकर बलि राजा के स्वागत</strong> में दीपोत्सव मनाया जाता है।</p>
<h3>4 <strong>भगवान श्रीराम का अयोध्या लौटना</strong></h3>
<p>14 साल का <strong>वनवास पूरा कर जब श्रीराम</strong><strong>, </strong><strong>सीता और लक्ष्मण</strong> अयोध्या लौटे, तो पूरे नगर में खुशियों की लहर दौड़ गई।<br />
अयोध्यावासियों ने अपने घरों में <strong>दीए जलाए</strong> और पूरे नगर को <strong>रोशनी से सजाया</strong>।<br />
वह रात <strong>कार्तिक अमावस्या</strong> की थी, और तभी से <strong>दीयों से अंधकार मिटाने वाला यह पर्व दीपावली</strong> कहलाया।</p>
<h3>5 <strong>युधिष्ठिर का राजसूय यज्ञ (महाभारत काल की कथा)</strong></h3>
<p>कौरवों से विभाजन के बाद पांडवों को जो जंगल मिला, उसे उन्होंने <strong>इंद्रप्रस्थ</strong> नामक सुंदर राज्य में बदल दिया।<br />
राजा <strong>युधिष्ठिर</strong> ने वहां <strong>राजसूय यज्ञ</strong> का आयोजन किया, जिसमें सैकड़ों राजा और प्रमुख लोग आए।<br />
राज्य की स्थापना के इस अवसर पर <strong>भव्य उत्सव मनाया गया</strong>, और उसी दिन से <strong>दीपावली का त्योहार</strong> मनाने की परंपरा बनी।</p>
<h2>लक्ष्मी पूजन की सही विधि और मान्यताएं</h2>
<h3><strong>कौन-सी तस्वीर की पूजा करनी चाहिए</strong><strong>?</strong></h3>
<ul>
<li><strong>खड़ी हुई लक्ष्मी जी की तस्वीर</strong> की पूजा नहीं करनी चाहिए।</li>
<li><strong>उल्लू पर बैठी लक्ष्मी जी</strong> की भी पूजा नहीं करनी चाहिए।</li>
<li>सबसे शुभ मानी जाती है <strong>कमल के फूल पर बैठी लक्ष्मी जी</strong> की तस्वीर या मूर्ति।</li>
<li>लक्ष्मी जी के साथ <strong>भगवान गणेश</strong> और <strong>कुबेर जी</strong> की भी पूजा करना चाहिए।</li>
</ul>
<h3></h3>
<p><img fetchpriority="high" decoding="async" class="alignnone  wp-image-25995" src="https://trendstopic.in/wp-content/uploads/2025/10/ipjt8n1760721454_1760804679-300x169.jpg" alt="" width="707" height="398" /></p>
<h3></h3>
<h3><strong>पूजन विधि (</strong><strong>Lakshmi Puja Vidhi): </strong><strong>आसान तरीका</strong></h3>
<ol>
<li>सबसे पहले घर और पूजा स्थान की अच्छी तरह सफाई करें।</li>
<li>चौकी या लकड़ी के पट्टे पर <strong>लाल कपड़ा बिछाकर</strong> मूर्तियाँ स्थापित करें।</li>
<li>पहले <strong>गणेश जी</strong> का पूजन करें, फिर <strong>लक्ष्मी जी</strong> का।</li>
<li>देवी को <strong>फूल</strong><strong>, </strong><strong>चावल</strong><strong>, </strong><strong>मिठाई</strong><strong>, </strong><strong>सिक्के और कपूर</strong> अर्पित करें।</li>
<li>मंत्र “<strong>ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं महालक्ष्म्यै नमः</strong>” का जाप करें।</li>
<li>पूजा के बाद घर के <strong>हर कोने में दीप जलाएं</strong> ताकि घर में सकारात्मक ऊर्जा फैले।</li>
</ol>
<h2>दीपावली का संदेश</h2>
<p>दीपावली सिर्फ <strong>धन और पूजा का त्योहार</strong> नहीं है, बल्कि <strong>अंधकार पर प्रकाश की जीत</strong> और <strong>बुराई पर अच्छाई की विजय</strong> का प्रतीक है।<br />
इस दिन हर कोई अपने घर, मन और जीवन में <strong>खुशियों की रोशनी जलाने</strong> का संकल्प लेता है।</p>
]]></content:encoded>
					
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			</item>
		<item>
		<title>7 Unique Diwalis: Bengal में जलती चिताओं के बीच होती है Kali Puja, 154 साल पुरानी Tradition अब भी जारी</title>
		<link>https://theupdatesnews.com/7-unique-diwalis-bengal-mem-jalati-cita-om-ke-bica-hoti-hai-kali-puja-154-sala-purani-tradition-aba-bhi-jari/</link>
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		<dc:creator><![CDATA[trendstopicnews@gmail.com]]></dc:creator>
		<pubDate>Sat, 18 Oct 2025 06:49:45 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[जहां देशभर में दिवाली दीयों, मिठाइयों और आतिशबाज़ी से रोशन होती है, वहीं पश्चिम बंगाल में दिवाली की रात एक अनोखा और रहस्यमयी नज़ारा देखने को मिलता है। यहां दीपावली के दिन काली पूजा होती है — और वो भी किसी मंदिर में नहीं, बल्कि श्मशान घाट में। महाश्मशान में जलती चिताओं के बीच पूजा [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[<p>जहां देशभर में दिवाली दीयों, मिठाइयों और आतिशबाज़ी से रोशन होती है, वहीं <strong>पश्चिम बंगाल</strong> में दिवाली की रात एक अनोखा और रहस्यमयी नज़ारा देखने को मिलता है।<br />
यहां दीपावली के दिन <strong>काली पूजा</strong> होती है — और वो भी किसी मंदिर में नहीं, बल्कि <strong>श्मशान घाट</strong> में।</p>
<h3><strong>महाश्मशान में जलती चिताओं के बीच पूजा</strong></h3>
<p>कोलकाता का <strong>केवड़ातला महाश्मशान</strong> इस पूजा के लिए जाना जाता है। यह जगह मशहूर <strong>कालीघाट मंदिर</strong> के पास है, जहां चौबीसों घंटे चिताएं जलती रहती हैं।<br />
इसी वजह से इसे “<strong>महाश्मशान</strong>” कहा जाता है।<br />
हर साल यहां <strong>डोम संप्रदाय</strong> के लोग श्मशान की दीवारों की सफाई और रंगाई-पुताई करते हैं, क्योंकि दिवाली के दिन यहीं पर मां काली की पूजा होती है।</p>
<p>पूजा के आयोजक <strong>उत्तम दत्त</strong> बताते हैं कि यहां पूजा की परंपरा बाकी जगहों से बिल्कुल अलग है।</p>
<p>“जब तक श्मशान में कोई शव नहीं आता, हम देवी को भोग नहीं चढ़ाते। और पूजा के समय यहां जलने वाली एक चिता को पंडाल में रखा जाता है,”<br />
वे कहते हैं।</p>
<p>ऐसा कहा जाता है कि पूरे बंगाल में इस तरह की पूजा <strong>सिर्फ कालीघाट के श्मशान</strong> में होती है।</p>
<h3><strong>150 </strong><strong>साल पुरानी परंपरा</strong><strong>, </strong><strong>काली की अलग रूप में होती पूजा</strong></h3>
<p>यह परंपरा करीब <strong>1870 </strong><strong>में शुरू हुई थी</strong>, जब एक <strong>कापालिक साधु</strong> ने दो स्थानीय ब्राह्मणों की मदद से श्मशान में पहली बार पूजा की थी।<br />
तब से लेकर अब तक, यह परंपरा हर साल बिना रुके निभाई जा रही है।</p>
<p>यहां मां काली की मूर्ति भी बाकी जगहों से अलग होती है —<br />
आम तौर पर काली माता की मूर्तियों में <strong>8 </strong><strong>से </strong><strong>12 </strong><strong>हाथ</strong> और <strong>बाहर निकली हुई जीभ</strong> होती है,<br />
लेकिन इस पूजा की मूर्ति में <strong>सिर्फ दो हाथ</strong> होते हैं और <strong>जीभ अंदर रहती है।</strong></p>
<p>उत्तम दत्त के अनुसार,</p>
<p>“चिताओं के बीच मां काली की यह पूजा सबसे पवित्र और रहस्यमयी मानी जाती है।”</p>
<h3><strong>टेंगरा का चीनी काली मंदिर </strong><strong>– Faith Beyond Borders</strong></h3>
<p>कोलकाता का <strong>टेंगरा इलाका</strong>, जो “<strong>चाइनाटाउन</strong>” के नाम से भी जाना जाता है, वहां एक बहुत ही अनोखा मंदिर है — <strong>चीनी काली मंदिर</strong>।<br />
यहां हिंदू और चीनी संस्कृति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।</p>
<p>मंदिर के पुजारी <strong>अर्णब मुखर्जी</strong> बताते हैं कि करीब <strong>60 </strong><strong>साल पहले</strong> एक <strong>चीनी परिवार</strong> का बच्चा बहुत बीमार पड़ गया था।<br />
जब सारे इलाज नाकाम रहे, तो उसके परिवार ने एक <strong>पेड़ के नीचे रखी नारायण शिला (पवित्र पत्थर)</strong> की पूजा की।<br />
कहते हैं, कुछ ही दिनों में वह बच्चा <strong>चमत्कारिक रूप से ठीक हो गया।</strong></p>
<p>उसके बाद से चीनी समुदाय के लोगों में <strong>काली माता के प्रति गहरी श्रद्धा</strong> जागी। उन्होंने मिलकर <strong>मंदिर का निर्माण</strong> कराया।<br />
आज भी यहां चीन और भारत दोनों देशों के भक्त पूजा करने आते हैं — <strong>बीजिंग से भी लोग यहां पहुंचते हैं।</strong></p>
<p>मंदिर की एक खास बात यह है कि यहां <strong>मांस का भोग नहीं चढ़ाया जाता</strong>,<br />
क्योंकि यहां <strong>नारायण शिला</strong> है, इसलिए केवल <strong>शाकाहारी भोग</strong> ही चढ़ता है।</p>
<h3><strong>7 </strong><strong>अनोखी दिवाली सीरीज़ की बाकी कहानियां भी दिलचस्प हैं</strong></h3>
<p>यह रिपोर्ट “<strong>7 </strong><strong>अनोखी दिवाली</strong>” सीरीज़ का हिस्सा है, जिसमें देशभर की अलग-अलग परंपराएं बताई जा रही हैं —</p>
<h4><strong>अरुणाचल प्रदेश </strong><strong>– </strong><strong>मक्खन के दीयों से दिवाली</strong></h4>
<p>अरुणाचल के <strong>तवांग</strong> इलाके में दिवाली का मतलब होता है <strong>शांति और प्रार्थना</strong>।<br />
यहां <strong>पटाखों का शोर नहीं</strong>, बल्कि <strong>बटर लैंप्स (मक्खन के दीये)</strong> से रोशनी होती है।<br />
<strong>मोनपा जनजाति</strong> और बौद्ध अनुयायी अपने घरों और मठों में मक्खन के दीये जलाते हैं — ये पूरी तरह <strong>इको-फ्रेंडली दिवाली</strong> होती है।</p>
<h4><strong>केरल </strong><strong>– ‘</strong><strong>पोलियंथ्रा</strong><strong>’ </strong><strong>उत्सव</strong></h4>
<p>केरल के <strong>कासरगोड जिले</strong> में तूलूभाषी समुदाय दिवाली के दिन <strong>‘</strong><strong>पोलियंथ्रा</strong><strong>’</strong> मनाता है।<br />
वे <strong>एझिलम पाला पेड़ की </strong><strong>7 </strong><strong>शाखाओं</strong> से लकड़ी का <strong>दीपस्तंभ (</strong><strong>Poliyanthram Pala)</strong> बनाते हैं और उसे <strong>आंगन</strong><strong>, </strong><strong>कुएं या अस्तबल के पास</strong> सजाते हैं।<br />
यह त्योहार <strong>बालि पूजा</strong> और <strong>दीपोत्सव</strong> दोनों का प्रतीक है।</p>
<h4><strong>सिक्किम </strong><strong>– </strong><strong>तिहार उत्सव</strong></h4>
<p>सिक्किम में दिवाली को <strong>“</strong><strong>तिहार</strong><strong>”</strong> कहा जाता है। यह <strong>5 </strong><strong>दिन</strong> तक चलता है और इसे <strong>गोरखा समुदाय</strong> मनाता है।<br />
इस त्योहार में <strong>कौवों</strong><strong>, </strong><strong>कुत्तों</strong><strong>, </strong><strong>गायों और बैलों</strong> की पूजा होती है।<br />
मान्यता है कि <strong>यमुना ने यमराज को बुलाने के लिए इन्हीं को दूत के रूप में भेजा था।</strong><br />
यह त्योहार <strong>पशु-पक्षियों</strong><strong>, </strong><strong>प्रकृति और इंसानों के रिश्ते</strong> का उत्सव है।</p>
<p>दिवाली जहां एक ओर रोशनी, खुशी और उल्लास का प्रतीक है,<br />
वहीं देश के अलग-अलग हिस्सों में इसे <strong>अलग अर्थों और आस्थाओं</strong> के साथ मनाया जाता है।<br />
<strong>बंगाल का श्मशान में जलता दीपक</strong>, <strong>अरुणाचल का मक्खन का दीया</strong>, <strong>केरल का लकड़ी का दीपस्तंभ</strong>,<br />
या <strong>सिक्किम की पशु पूजा</strong> — सब एक ही बात सिखाते हैं:</p>
<p>“अंधकार पर प्रकाश और भय पर विश्वास की जीत।”</p>
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		<title>Kedarnath Dham के कपाट खुले: 108 क्विंटल फूलों से सजा मंदिर, पहले ही दिन 10 हजार श्रद्धालु पहुंचे।</title>
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		<dc:creator><![CDATA[Rohit]]></dc:creator>
		<pubDate>Fri, 02 May 2025 06:04:56 +0000</pubDate>
				<category><![CDATA[धर्म]]></category>
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					<description><![CDATA[Kedarnath Dham के कपाट शुक्रवार को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलते ही भक्तों ने मंदिर में जल रही अखंड ज्योति के दर्शन किए। इसके बाद रुद्राभिषेक, शिवाष्टक, शिव तांडव स्तोत्र और केदाराष्टक का पाठ किया गया। मंदिर में सबसे पहले कर्नाटक के वीरशैव लिंगायत समुदाय के मुख्य पुजारी (रावल) भीमशंकर पहुंचे। इसके [&#8230;]]]></description>
										<content:encoded><![CDATA[
<p>Kedarnath Dham के कपाट शुक्रवार को श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए। कपाट खुलते ही भक्तों ने मंदिर में जल रही अखंड ज्योति के दर्शन किए। इसके बाद रुद्राभिषेक, शिवाष्टक, शिव तांडव स्तोत्र और केदाराष्टक का पाठ किया गया।</p>



<p>मंदिर में सबसे पहले कर्नाटक के वीरशैव लिंगायत समुदाय के मुख्य पुजारी (रावल) भीमशंकर पहुंचे। इसके बाद बाबा केदार पर छह महीने पहले चढ़ाया गया भीष्म शृंगार हटाया गया।</p>



<p>मंदिर को 54 किस्म के 108 क्विंटल फूलों से सजाया गया है। इसमें नेपाल, थाईलैंड और श्रीलंका जैसे विभिन्न देशों से लाए गए गुलाब और गेंदा के फूल शामिल हैं।</p>



<p>पहले दिन करीब 10 हजार लोग दर्शन के लिए पहुंचे। भीड़ मैनेज करने के लिए टोकन सिस्टम से दर्शन करवाए जा रहे हैं। भक्त अब अगले 6 महीने तक दर्शन कर सकेंगे।</p>



<p>जून से अगस्त के बीच मौसम ठीक रहा तो इस बार 25 लाख से ज्यादा लोगों के केदारनाथ धाम पहुंचने का अनुमान है।</p>



<p>30 अप्रैल (अक्षय तृतीया) से चारधाम यात्रा शुरू हो चुकी है। गंगोत्री और यमुनोत्री धाम के कपाट खुल गए हैं। बद्रीनाथ धाम के कपाट 4 मई को खोले जाएंगे।</p>



<figure class="wp-block-image size-large is-resized"><img decoding="async" src="https://trendstopic.in/wp-content/uploads/2025/05/153d4b73-6c58-4872-b13c-99d5b65157b2-1024x576.webp" alt="" class="wp-image-22102" style="width:720px;height:auto" /></figure>



<p><strong>क्या है बाबा का भीष्म शृंगार, जिसे करने में 5 घंटे लगते हैं</strong></p>



<p>पट खुलने के बाद भीष्म शृंगार हटाया जाएगा। यह प्रक्रिया भी दिलचस्प है। सबसे पहले शिवलिंग के पास रखे गए मौसमी फल और ड्राई फ्रूट्स का ढेर हटाते हैं। इसे आर्घा कहते हैं।</p>



<p>फिर बाबा पर चढ़ी एक से लेकर 12 मुखी रुद्राक्ष की मालाएं निकालते हैं। इसके बाद शिवलिंग पर चारों ओर लपेटा गया सफेद कॉटन का कपड़ा हटाया जाता है।</p>



<p>पट बंद करते समय शिवलिंग पर 6 लीटर पिघले हुए शुद्ध घी का लेपन करते हैं, जो इस वक्त जमा होता है, इसे धीरे-धीरे शिवलिंग से निकालते हैं।</p>



<p>इसके बाद होता है शिवलिंग का गंगा स्नान। गोमूत्र, दूध, शहद और पंचामृत स्नान के बाद बाबा केदार को नए फूलों, भस्म लेप और चंदन का तिलक लगाकर तैयार किया जाएगा।</p>



<p>कपाट बंद करते समय भीष्म शृंगार में करीब 5 घंटे लग जाते हैं, लेकिन कपाट खोलने के बाद इसे आधे घंटे में हटा दिया जाता है।</p>
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